सोमवार, १२ दिसम्बर २०११
ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 807/2011/247
‘ते कि मैं झूठ बोलेया...’ : सलिल चौधरी
कल्पनाशील फ़िल्मकार राज कपूर के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में आयोजित श्रृंखला ‘आधी हक़ीक़त आधा फसाना’ की सातवीं कड़ी में, मैं कृष्णमोहन मिश्र, एक बार पुनः आपका हार्दिक स्वागत करता हूँ। अपने फिल्म-जीवन में राज कपूर ने १८ फिल्मों का निर्माण किया था। फिल्म ‘हिना’ का अधूरा निर्माण कर वे स्वर्ग सिधार गए, जिसे बाद में उनके पुत्रों ने पूरा किया। इन सभी फिल्मों के कथानक सामाजिक यथार्थ की भूमि से जन्म लेते थे, किन्तु उनका ऊपरी स्वरूप फंतासी की तरह दिखता था। इन १८ फिल्मों में एक फिल्म ‘जागते रहो’ ऐसी है, जिसमें सामाजिक यथार्थ की मात्रा अधिक और फंतासी नाममात्र के लिए है। राज कपूर इस फिल्म के निर्माता और अभिनेता थे।
फिल्म ‘जागते रहो’ एक सफल बांग्ला नाटक ‘एक दिन रात्रे’ पर आधारित है, जिसमे एक रात की कहानी है। यह फिल्म महानगरीय सभ्यता के खोखलेपन को चित्रित करता है। फिल्म का निदेशन सुप्रसिद्ध रंगकर्मी-जोड़ी शम्भू मित्रा और अमित मैत्र ने किया था। फिल्म का नायक एक छोटे से गाँव से नौकरी की खोज में महानगर आया है। पूरा दिन भूखा-प्यासा, भटकता हुआ नायक एक बहुमंजिले भवन में पानी की तलाश में पहुँच जाता है। चौकीदार उसे चोर समझ कर शोर मचा देता है। घबरा कर वह खुद को छिपाने के लिए भवन की हर मंज़िल और हर फ्लैट में भटकता फिरता है। इन सभी फ्लैट में उसे तथाकथित सभ्य समाज का वास्तविक चेहरा दिखाई देता है। राज कपूर की यही एकमात्र फिल्म है, जिसमे अधिकतम हक़ीक़त है और नाममात्र का फसाना। राज कपूर ने इस गम्भीर कथ्य में भी मनोरंजन का प्रयास किया है। करारे व्यंग्य के बीच हास्य के क्षण भी हैं। पूरी फिल्म में नायक कुछ नहीं बोलता। केवल अन्त में वह कहता है- ‘मैं थका-हारा-प्यासा पानी पीने यहाँ चला आया, और सब लोग मुझे चोर समझ कर मेरे पीछे भागे, जैसे मैं कोई पागल कुत्ता हूँ। मैंने यहाँ हर तरह के लोग और चेहरे देखे। मुझ गँवार को तुमसे यही शिक्षा दी कि चोरी किये बिना कोई बड़ा आदमी नहीं बन सकता... क्या सचमुच चोरी किये बिना कोई बड़ा आदमी नहीं बन सकता?’ यह जलता हुआ प्रश्न राज कपूर ने देश के कर्णधारों से पूछा है। राज कपूर जैसे जागरूक फ़िल्मकार ने भावी भारतीय समाज का पूर्वानुमान १९५६ में ही कर लिया था।
फिल्म ‘जागते रहो’ के निर्माण की योजना बनाते समय राज कपूर के साथियों ने इस शुष्क विषय पर फिल्म न बनाने का सुझाव दिया, किन्तु उनके मस्तिष्क में यह विषय इतनी गहराई तक पैठ चुका था कि उन्होने उस सुझाव को दरकिनार कर दिया। फिल्म के अन्तिम दृश्य में प्यासा नायक अन्ततः एक बाग में पहुँचता है, जहाँ नरगिस पौधों को सींच रही थी। रात भर का प्यासा नायक उस युवती के हाथ से जी भर कर पानी पीकर तृप्त हो जाता है। यह प्यास एक व्यक्ति के रूप में और एक प्रेमी हृदय वाले राज कपूर की थी और फ़िल्मकार राज कपूर की भी थी। फिल्म ‘जागते रहो’ का एक विचित्र तथ्य यह भी है कि राज कपूर द्वारा निभाए गये चरित्र को पानी पिला कर तृप्त करने वाली नरगिस की राज कपूर के साथ यह अन्तिम फिल्म सिद्ध हुई।
फिल्म ‘जागते रहो’ का निर्माण आरम्भ होने से पहले शंकर-जयकिशन, राज कपूर की फिल्मों के स्थायी संगीतकार बन चुके थे। ‘बरसात’, ‘आवारा’, ‘श्री४२०’, ‘चोरी चोरी’ आदि के गीत अत्यन्त जनप्रिय हो चुके थे। इसके बावजूद ‘जागते रहो’ के लिए राज कपूर ने शंकर-जयकिशन के स्थान पर जनवादी विचारधारा के संगीतकार सलिल चौधरी को फिल्म के संगीत का दायित्व दिया। राज कपूर की दूरदृष्टि ने इस तथ्य को पहचान लिया था कि शंकर-जयकिशन के संगीत में आधी हक़ीक़त और आधा फसाना अभिव्यक्त होता है, जब कि सलिल चौधरी के संगीत से केवल हक़ीक़त। सलिल चौधरी ने फिल्म के कथानक के अनुरूप सूर्योदय के राग भैरव को केन्द्र में रख कर संगीत रचा। रात में होने वाले पाप को धोने और जनमानस में जागृति लाने के लिए भैरव के स्वरों से लिप्त गीत- ‘जागो मोहन प्यारे...’ की ही आवश्यकता थी। सलिल दा ने इस फिल्म में दर्शनिकता से परिपूर्ण गीत- ‘ज़िन्दगी ख्वाब है...’ की भी रचना की, जिसे अभिनेता मोतीलाल पर फिल्माया गया था। (यह दोनों गीत हम ‘ओल्ड इज़ गोल्ड’ की पूर्व श्रृंखलाओं में सुनवा चुके हैं)। आज जो गीत हम आपको सुनवाने जा रहे हैं, उसमें सलिल चौधरी की लोक-संगीत-प्रतिभा उजागर होती है। पंजाब के लोक-संगीत-नृत्य शैली ‘भांगड़ा’ पर आधारित गीत- ‘ते की मैं झूठ बोलेया...’ आज आपके लिए उपहार है। इस गीत को मोहम्मद रफी और एस. बलबीर ने स्वर दिया है, गीतकार हैं प्रेम धवन और संगीतकार तो सलिल चौधरी हैं ही।
गीत -‘ते की मैं झूठ बोलेया...’ : फिल्म – जागते रहो : संगीत – सलिल चौधरी
क्या आप जानते है...कि फिल्म ‘जागते रहो’ के कथानक में घटित घटना की अवधि और फिल्म की अवधि लगभग समान है। रात्रि एक बज कर बीस मिनट से आरम्भ घटनाक्रम सूर्योदय से पूर्व ही समाप्त हो जाता है।
कृष्णमोहन मिश्र
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4 टिप्पणियाँ
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indu puri ने कहा…
- मेरी बचपन की सहेली शारदा आ गई थी आज. थोड़ी देर पहले ही गईं है. कहती है 'चाहे जिंदगी से कितना भी भागो तेरे दिल की आग नही बुझेगी...' लो जी यहाँ भागना कौन चाहता है. अभी तो आज के प्रश्न का उत्तर देना है. बीच-बीच मे आकर देखा, कोई आया या नही? कोई नही आया. हद है. मुनादी पिटवाओ. गुमशुदा की तलाश के इश्तिहार लगाओ भई. 'सी. रामचंद्र जी' को लेते जाना रिपोर्ट लिखवाने. लिखवा देना पाबला जी, अवध जी, अमित जी, पद्म सिंह, राज जी और भी तो है न अपने कुछ, जो बाहर रहते हैं, सब गायब है आज कल. उनका नाम भी लिखवा देना. ओ के? क्या करूं? ऐसिच हूँ मैं तो...
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indu puri ने कहा…
- आश्चर्य! मेरा कमेन्ट कहाँ गया. चटपटे अंदाज़ मे मैंने बहुत कुछ लिखा था. फिर गया कहाँ? उत्तर भी एकदम सही लिखा था. पहेली के रूप मे शारदा फिल्म का नाम और गाना भी बता दिया था और संगीतकार का नाम उत्तर के तौर पर दिया था क्योंकि वो तीन नम्बर का था. उफ़ !
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indu puri ने कहा…
- हे भगवान! आज दुबारा व्यूज़ दिए. शिकायत की फिर भी.........यहाँ नही दिख रहे. गये कहाँ? जरूर स्पैम मे होंगे. देखिये प्लीज़
- ते की मैं झूठ बोलेया... ग़ज़ब का गीत!