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Friday, 13 April 2012

'अपने सुरों में मेरे सुरों को बसा लो' 9

गीत मन्ना डे के
May 4, 2011 
ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 649/2010/349

'हटो काहे को झूठी बनाओ बतियाँ...' मेलोडी और हास्य के मिश्रण वाले ऐसे गीत अब लगभग लुप्त हो चुके हैं

'ओल्ड इज गोल्ड' पर जारी है, सुर गन्धर्व मन्ना डे पर श्रृंखला 'अपने सुरों में मेरे सुरों को बसा लो'। मन्ना डे के गीतों की चर्चा महमूद के बिना अधूरी रहेगी। हास्य अभिनेता महमूद नें रुपहले परदे पर बहुतेरे गीत गाये, जिन्हें मन्ना डे ने ही स्वर दिया। एक समय ऐसा लगता था, मानो मन्ना डे, महमूद की आवाज़ बन चुके हैं। परन्तु बात ऐसी थी नहीं। इसका स्पष्टीकरण फिल्म "पड़ोसन" के प्रदर्शन के बाद स्वयं महमूद ने दिया था। पत्रकारों के प्रश्न के उत्तर में महमूद ने कहा था -"मन्ना डे साहब को मेरी नहीं बल्कि मुझे उनकी ज़रुरत होती है। 'उनके गाये गानों पर मैं स्वतः ही अच्छा अभिनय कर पाता हूँ।" महमूद के इस कथन में शत-प्रतिशत सच्चाई थी। यह तो निर्विवाद है कि उन दिनों शास्त्रीय स्पर्श लिये गानों और हास्य मिश्रित गानों के लिए मन्ना डे के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं था। उस दौर के प्रायः सभी हास्य अभिनेताओं के लिए मन्ना डे ने पार्श्वगायन किया था।

1961 में एक फिल्म आई थी "करोड़पति', जिसमें किशोर कुमार नायक थे। किशोर कुमार उन दिनों गायक के रूप में कम, अभिनेता बनने के लिए अधिक प्रयत्न कर रहे थे। फिल्म में संगीत शंकर-जयकिशन का था। मन्ना डे नें उस फिल्म में हास्य गीत -"पहले मुर्गी हुई कि अंडा, जरा सोच के बताना...." गाया था जो परदे पर किशोर कुमार पर फिल्माया गया था। इसके अलावा जाने-माने हास्य अभिनेता जॉनी वाकर के लिए 1962 की फिल्म -"बात एक रात की" में सचिनदेव बर्मन के संगीत निर्देशन में हास्य गीत -"किसने चिलमन से मारा नज़ारा मुझे..." गाया था। इस गीत में कव्वाली के साथ हास्य का अनूठा मिश्रण था। 1966 में हास्य अभिनेता आग़ा के लिए मन्ना डे नें रोशन के संगीत निर्देशन में फिल्म -"दूज का चाँद" में ठुमरी (भैरवी) अंग में हास्य गीत -"फूल गेंदवा ना मारो, लगत करेजवा में चोट...." गाया। दरअसल मन्ना डे को 'बोल-बनाव की ठुमरी' का अच्छा अभ्यास था, इस कारण वो शब्दों को स्वरों के माध्यम से अपेक्षित रस-भाव की ओर मोड़ लेते थे।

महमूद के लिए मन्ना डे नें कई हिट गाने गाये। 1966 की फिल्म 'पति-पत्नी' में मन्ना डे ने महमूद के लिए राहुल देव बर्मन के संगीत निर्देशन में गीत -"अल्ला जाने मैं हूँ कौन, क्या है मेरा नाम...." गाया था। इसी वर्ष फिल्म 'लव इन टोकियो' का गीत-"मैं तेरे प्यार का बीमार...", 1968 में फिल्म 'दो कलियाँ' का गीत -"मुस्लिम को तस्लीम अर्ज़ है, हिन्दू को परनाम..." आदि ऐसे कई गाने हैं, जिन्हें खूब लोकप्रियता मिली। मन्ना डे द्वारा महमूद के लिए गाये गए गीतों में से दो गीतों का उल्लेख आवश्यक है। पहला हास्य गीत है फिल्म 'पड़ोसन' का जिसमे मन्ना डे के साथ किशोर कुमार की आवाज़ भी शामिल है। आपको याद ही होगा कि 1961 की फिल्म 'करोडपति' में मन्ना डे ने किशोर कुमार के लिए पार्श्वगायन किया था। वही किशोर कुमार 1968 की फिल्म 'पड़ोसन' में मन्ना डे के साथ मिल कर एक अविस्मरणीय हास्य गीत -"एक चतुर नार..." फिल्म-संगीत-प्रेमियों को देते हैं। किशोर कुमार की प्रशंसा करते हुए मन्ना डे ने कहा भी था -"किशोर जन्मजात प्रतिभा के धनी थे। बिना सीखे वह इतना अच्छा गाकर सबको चकित कर देते थे"। फिल्म 'पड़ोसन' के इस गीत की चर्चा करते हुए मन्ना डे ने यह भी कहा था -"गाने के रिहर्सल और रिकार्डिंग के अवसर पर महमूद उपस्थित थे। उनकी सलाह से गाने में कई 'मसाले' डाले गए, जिससे गाना और अधिक लोकप्रिय हुआ"।


महमूद के लिए मन्ना डे का दूसरा उल्लेखनीय गीत 1960 की फिल्म 'मंजिल' से है। सचिनदेव बर्मन इस फिल्म के संगीतकार थे। उन्होंने इस फिल्म के लिए एक परम्परागत 'दादरा' चुना, जिसके बोल हैं -"बनाओ बतियाँ हटो काहे को झूठी....."। राग "भैरवी" में निबद्ध यह 'दादरा' भी मन्ना डे के लिए एक चुनौती था, क्योंकि इससे पहले कई शास्त्रीय गायक इसे गा चुके थे। उस्ताद मुनव्वर अली खाँ (उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के सुपुत्र) और गायिका गुलशन आरा सईद (बाद में पाकिस्तान चली गईं) ने इस 'दादरा' को अपने स्वरों से सजाया था। मान-मनुहार से ओत-प्रोत इस दादरा में मन्ना डे ने हास्य का ऐसा सूक्ष्म भाव भर दिया कि महमूद पर फिल्माए जाने के बाद यह 'दादरा' एक नये अनूठे रंग से भर गया। आज हमने आपको सुनाने के लिए फिल्म 'मंजिल' का यही 'दादरा' चुना है| गीतकर मजरूह सुल्तानपुरी और संगीतकार सचिन देव बर्मन।

फिल्म - मंज़िल : "बनाओ बतियाँ हटो काहे को झूठी....." : संगीत - सचिनदेव बर्मन



Posted 4th May 2011 by Sajeev Sarathie